नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, टिहरी गढ़वाल द्वारा एक जांच अधिकारी (IO) के वेतन से 500 रुपये की कटौती कर मुआवजा देने के आदेश को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी सरकारी सेवक के वेतन से दंडात्मक कटौती बिना सुनवाई का अवसर दिए नहीं की जा सकती।

मामला 2013 का है। उप-निरीक्षक सरिता शाह ने टिहरी गढ़वाल में दर्ज एक बलात्कार के मामले की जांच की थी। पीड़िता नाबालिग थी और आरोप उसके पिता व चाचा पर था। IO सरिता शाह ने जांच पूरी कर धारा 376 एवं 506 IPC के तहत दोनों आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद दोनों को बरी कर दिया और IO पर टिप्पणी की कि उन्होंने एक आरोपी को निराधार फंसाया एवं गिरफ्तार किया। सत्र न्यायाधीश ने धारा 358 CrPC के तहत IO को 500 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और SP टिहरी को निर्देश दिया कि यह राशि सरिता शाह के वेतन से काटी जाए।

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सरिता शाह ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उनके अधिवक्ता ने दलील दी कि:

  • धारा 358 CrPC के प्रावधान IO पर लागू नहीं होते।
  • मुआवजा देने का अधिकार मजिस्ट्रेट को है, सत्र न्यायाधीश को नहीं।
  • वेतन कटौती सेवा करियर पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, इसलिए बिना सुनवाई के ऐसा आदेश असंवैधानिक है।
  • नामों में मामूली भ्रम के आधार पर IO को दोषी ठहराना उचित नहीं था।

उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए सत्र न्यायाधीश का पूरा आदेश निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन अनिवार्य है। बिना पक्ष सुने दंड नहीं दिया जा सकता। IO की टिप्पणी व वेतन कटौती का आदेश रद्द।

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